India Contestant 2022 added a new official participant Radha Shailendra from Bhagalpur
नमस्ते दोस्तों🙏
नमस्ते दोस्तों,मैं राधा शैलेन्द्र,भागलपुर ,बिहार से आज आपके सामने अपने साहित्यिक जीवन यात्रा की कहानी लेकर आई हूँ शायद मेरी ये कहानी आप सबों के लिए एक प्यारी सी प्रेरणा हो कि अगर आप शिद्दत से किसी भी ज़ज्बे को लेकर चलते है तो यकीनन जिंदगी आपकी शख्शियत को मुकम्मल बना देती है।
महज 14 वर्ष की चोटी सी उम्र में मेरी पहली किताब "आईना" प्रकाशित हुई, जिसे पढ़कर श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी इतने प्रभावित हुए की वो जबतक रहे तकरीबन 23 वर्षों तक अपने खतों के द्वारा मेरी हौसलाअफजाई करते रहे।इस महान हस्ती के प्यार ने मुझे हौसले का पर दे दिया।मेरी जिंदगी में मेरे पापा श्री पारस नाथ सिंह,(वाणिज्य कर आयुक्त) की सबसे अहम भूमिका रही ,घर में सभी भी बहनों में सबसे छोटी थी
इसलिए प्यार भी सबों से बेपनाह मिला।पापा अक्सर कहा करते थे "कभी किसी से तुलना मत करना,क्योंकि जो तुलना में चला गया वो तकलीफ में होता गया,अपना कद बढ़ाओ तरक्की खुद मिल जायेगी।"
18मई 1997 को मेरी शादी शैलेन्द्र जी से हुई,दो अलग परिवेश , अलग तरह के लोग,ससुराल की सारी जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गयी
लेकिन सिर्फ इनका एक वाक्य" मैं हूँ न" मेरी हिम्मत बना
अर्थशास्त्र से प्रतिष्ठा तो मैं थी ही,शादी के बाद एक प्यारी सी बेटी हर्षिता हुई और मैंने अपना एल.एल.बी भी पूरा कर लिया।सारे काम करते हुए मैं जीवन पथ पर बढ़ी जा रही
थी पर मेरी प्यारी लेखनी डायरी में सिमटती जा रही थी।इसका एहसास मेरे प्यारे छोटे भैया भक्तवत्सलम को हुआ उन्होंने अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन के साथ मिलकर मेरी दूसरी काव्य- संकलन "भीड़ के चेहरे" का लोकापर्ण त्रिपुरा के राज्यपाल श्री सिदेश्वर प्रसाद के हाथों पटना में करवाया। इस काव्य - संकलन को इतनी कामयाबी मिली कि इसे तत्कालीन राष्ट्रपति श्री के.आर.नारायणन के राष्ट्रपति सचिवालय के पुस्तकालय में स्थान मिला।उसके बाद एक सिलसिला से चल निकला
अवार्डों का,महादेवी वर्मा राष्ट्रीय सम्मान,डॉ अम्बेडकर अवार्ड,दिल्ली से,सुमन चतुर्वेदी सम्मान भोपाल से,वीरांगना सावित्री बाई फुले फैलोशिप अवार्ड,कवयित्री श्री सम्मान,श्रेस्ठ साहित्य साधना सम्मान ये कुछ ऐसे सम्मान थे जिन्होंने मेरी लेखनी में एक नई रफ्तार भर दी
पर जिंदगी अचानक एक ऐसे मोड़ पर लाती है जहां लगता है बहुत कुछ खत्म हो गया ....23 सितंबर 2002 मेरे पापा चले गए मैं रुक गयी ...थम गयी पर उनके कहे शब्द हमेशा कानों में गूँजते रहे कि" जो यकीनन मुझसे प्यार करेगा वो मेरे जाने के बाद भी अपने कामों से मुझे जिंदा रखेगा" बस यही से एक शुरुआत हुई"....फिर भी"
मेरी तीसरी काव्य संकलन जो मैंने मेरे पापा के लिये लिखी।उनके आशीर्वाद का जादू था या उनके प्रति मेरी श्रद्धांजलि का ...फिर भी को भगवान बुद्ध राष्ट्रीय सम्मान मैसूर में,तिलकामांझी राष्ट्रीय सम्मान,भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी नेशनल एक्सीलेंस अवार्ड,साहित्य साधना सम्मान,अंगभूषण सम्मान से नवाजा गया।ये सिलसिला बस चलता ही रहा और मेरी जिंदगी में मेरा प्यार बेटा हर्षित आ गया।बच्चों की परवरिश,सास- ससुर की सेवा और लेखन कार्य इन तीन महत्वपूर्ण कामों के बीच अपने जुनून को जिंदा रखना
मेरे लिए किसी संघर्ष से कम नहीं रहा।पर इतनी व्यस्यता
के बाद अगर लिख नहीं पाती तो लगता कुछ अधूरा सा है।मेरी कविताएं भागलपुर आकाशवाणी से भी प्रसारित होती रहती है।विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में मेरा रचना प्रकाशित होती रहती है।सिर्फ इतना ही नहीं समाजसेवा में भी मैं हमेशा अपना योगदान देती रहती हूँ इससे मुझे काफी सकून मिलता है।हाल ही मैं मानवधिकार टुडे ने मुझे "कोरोना वॉरियर्स सम्मान" से सम्मानित किया है।
मैंने समाज के हर पहलू,हर दर्द को अपनी कविताओं में उतारा है,चाहे वो दहेज की आग हो,तेजाब की जलन हो,नारी के हर रंग को समाज के सामने रखने की कोशिश की पर हर बार मैं टूट जाती जब भी लगता बस अब नहीं कुछ छुट जाता मुझसे ,अब मेरी माँ चली गई एक शानदार व्यक्तिव जो मेरे लिए एक विशाल छाया थी दूर चली गई पर उनकी दुआओं का ऐसा असर निकल की उनकी ये बेटी केंद्रीय मंत्री श्री रवि शंकर प्रसाद के हाथों शताब्दी सम्मान पा गयी।मैंने जिंदगी को जितने करीब से देखा है उससे बस इतना ही जान पायी हूँ कि चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियों से आपका सामना हो आपकी एक सकारात्मक सोच आपको उस अंधेरे से निकाल सकती है।
मेरी माँ सादगी की वो मूरत थी जिसने हमें सिर्फ प्यार और प्यार दिया और एक प्यारी सी सीख की "दुनिया तुम्हारे साथ कितना भी बुरा करें तुम अपनी अच्छाई मत छोड़ना क्योंकि तुम्हें जज करने वाला ऊपर बैठा है,"
आज जब अपनी सारी उपलब्धियों पर नजर डालती हूँ तो एक प्यारा सा शख्स यानि मेरे शैलेन्द्र मुझे नजर आते है जो हमेशा मेरा साथ देते रहें उन्हें मैं क्या दे सकती थी इसलिए अपना साहित्यिक सरनेम ही उनके नजर कर बैठी "राधा शैलेन्द्र"!
ईश्वर के आशीर्वाद से दो प्यारे बच्चे जिन्होंने मुझे कागज कलम से बाहर निकालकर शोशल मीडिया की दुनिया से आप सबों तक पहुँचाया।मेरी बेटी हर्षिता हमेशा मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती है"माँ पहले आप लिख लो फिर कुछ करना,वरना वो फ़ीलिंग्स खो जायेगी
प्लीज् माँ बस अभी।" सच कहती है वो,हर भावनाएं लम्हों पर ही निर्भर करती है हर बात बदल जाती है कुछ पलों में!
बेटा आदित्य हर्षित मेरी उपलब्धियों से काफी खुश होता है,उसकी खामोशी और प्यार से गले लगाना बताता है कि वो कितना खुश होता है मेरी हर उपलब्धि से।
ये कुछ ऐसी बातें है जो मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती है।मेरी एक प्यारी सी दीदी है आभा,वो अपने प्यार की आभा और दुआएं अक्सर मेरे साथ रखती है!।
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